‘स्मृति-दीर्घा’ हमारे कवि-लेखकगण का एक ऐसा अभिनव ब्लॉग है जिसमें वे स्वयं ब्लॉग-स्वामी की तरह अपनी आपबीती, अपने संस्मरण या डायरी के कुछ पन्ने जैसे अपनी स्मृति के किसी विशिष्ट क्षणों को दर्ज कर सकते हैं। यह एक तरह से उनके स्व-जीवनानुभव को अभिव्यक्त करने का लेखकीय मंच है। इसलिये यहाँ किसी प्रकार की प्रकाशकीय सहमति की जरुरत नहीं। सिर्फ़ उन्हें लिखने हेतु अपने लेखकीय-स्वत्वाधिकार के लिये हमें एक अपने ई-पत्र से इस पते पर सूचना भेजनी होगी -sk.dumka@gmail.com ताकि उन्हें इस ब्लॉग से जोड़ा जा सकें। अतएव इस साझा-मंच से हमसब अपनी आपबीती... चाहे वह कृति से जुड़ी हो या जि़न्दगी से, अन्य पाठकों से विनिमय कर सकते हैं और इसकी फलश्रुति यह होगी कि हम एक दूसरे के रचना-संसार के बाहर भी उन पहलूओं और गतिविधियों की जानकारी ले सकेंगे जिसे हम साहित्य की भाषा में संस्मरण, डायरी या आपबीती कह सकते हैं। हिन्दी की बेहतर सेवा के लिये हम आपके निरन्तर सहयोग की अपेक्षा रखते हैं।

रविवार, ८ नवम्बर २००९





कथादेश के फरवरी 2009 अंक में, 2005 के साहित्य के लिए  नोबल पुरुस्कार से  सम्मानित हैरोल्ड पिंटर के बारे में पढ़ते हुए मुझे लगा कि क्यों न इसे उन पाठकों से भी बांटा जाए जो शायद इसे पढ़ने से रह गए हों...

1 टिप्प्णिय़ाँ:

सुरेश यादव ने कहा…

हेराल्ड पिंटर का आलेख और कवितायेँ सायास युद्ध से आक्रांत मानवता के पक्ष में एक आवाज़ है.काजल कुमार को प्रकाशन के लिए ,यादवेन्द्र जी को सहज अनुवाद के लिए बधाई.09818032913

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